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राजस्थानः CM की रेस में गहलोत से क्यों पिछड़ गए पायलट, ये हैं बड़ी वजह




राजस्थान में मुख्यमंत्री पद को लेकर लंबा संघर्ष देखने को मिला. 3 दिन चले कांटेदार मुकाबले में सचिन पायलट अशोक गहलोत से मुख्यमंत्री पद की रेस में पिछड़ गए. हालांकि संघर्ष के बीच कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दोनों गुटों में एकजुटता दिखाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया था.




राजस्थान में मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही रस्साकशी अब खत्म हो गई है और युवा जोश के आगे अनुभव ने बाजी मार ली. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अशोक गहलोत को राज्य की कमान सौंपने का फैसला कर लिया. हालांकि उनके लिए यह फैसला करना इतना आसान नहीं था.

कांग्रेस से जुड़े सूत्रों के अनुसार, 11 दिसंबर को चुनाव परिणाम आने के बाद अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों गुट अपनी दावेदारी छोड़ने को राजी नहीं थे और यही कारण रहा कि परिणाम आने के बाद 3 दिन तक राज्य के इस शीर्ष पद के लिए संघर्ष चलता रहा. आखिरकार वो क्या कारण रहे जिसमें लंबे समय तक मुख्यमंत्री पद को लेकर अड़े रहने वाले सचिन पायलट अंत में रेस में पीछे हो गए. हम यहां आपको 4 अहम कारण बताने जा रहे हैं.

हालांकि, विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने खुद को एकजुट दिखाया. राज्य के 2 बड़े नेता गहलोत और पायलट ने भी पार्टी में एकजुटता दिखाई और दूसरी तरफ दोनों गुट मुख्यमंत्री पद हासिल करने की कोशिशों में जुटे रहे.

विधायकों का नहीं मिला समर्थन

कांग्रेस से जुड़े सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया कि 12 दिसंबर को जयपुर में पार्टी दफ्तर में नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक हुई, जिसमें गहलोत और पायलट दोनों ने मुख्यमंत्री पद के लिए अपना दावा पेश किया था. बैठक में पार्टी के पर्यवेक्षक केसी वेणुगोपाल ने फैसला लिया कि निर्वाचित विधायक स्लिप या पर्ची के जरिए गहलोत और पायलट में से किसी एक का चयन करें.

सूत्र बताते हैं कि बैठक में करीब 70 विधायकों ने गहलोत को मुख्यमंत्री बनाए जाने का समर्थन किया. इसके अलावा गहलोत कैंप ने 10 से ज्यादा निर्दलीय विधायकों के समर्थन का दावा भी किया. इनमें से कई निर्दलीय विधायकों ने खुलकर गहलोत को मुख्यमंत्री बनाए जाने का समर्थन किया था.

हालांकि, पायलट गुट ने गहलोत पर पार्टी में अंदरुनी अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाया और उन्होंने दावा किया कि अपने कई विश्वस्त और बेहद भरोसेमंद लोगों से निर्दलीय चुनाव लड़ने को कहा था, जिससे चुनाव बाद सरकार बनाने के लिए बाहर से समर्थन हासिल करने के लिए इनका इस्तेमाल किया जा सके. इनमें कुछ विजयी निर्दलीय उम्मीदवार हैं जिसमें कंडेला के विधायक महादेव सिंह कंडेला, श्रीगंगानगर से राजकुमार गौर और डुडु से बाबूलाल नागर शामिल हैं.

गहलोत को बहुमत नहीं मिलने का फायदा मिला

जयपुर में विधायकों के साथ बैठक के बाद अशोक गहलोत और पायलट दिल्ली चले आए जहां उन्होंने पार्टी पर्यवेक्षक वेणुगोपाल के साथ कई मैराथन बैठकों में हिस्सा लिया. साथ ही पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री पद के 2 बड़े दावेदारों के साथ कई अलग-अलग बैठकें भी की.

बैठक के बाद गहलोत जयपुर जाने के लिए एयरपोर्ट पहुंच गए, लेकिन पायलट के साथ एक और बैठक करने के लिए उन्हें अचानक रोक दिया गया. इसके बाद राहुल गांधी के साथ कई बैठकें होती रहीं.

वास्तव में कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में बहुमत से एक सीट कम 99 सीटें ही हासिल हुई हैं, जो अशोक गहलोत के पक्ष में चली गईं. गहलोत ने राज्य में मजबूत सरकार चलाने का वादा किया. नई सरकार को बहुमत के लिए बाहर से समर्थन चाहिए था, जिसमें वह हासिल करने में कामयाब रहे. कई निर्दलीय विधायकों ने पायलट की जगह बुजुर्ग नेता गहलोत का खुलकर समर्थन किया.

गहलोत गुट ने यह दावा भी किया कि कुछ ही महीनों के अंदर लोकसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में राज्य में एक ऐसी मजबूत सरकार चाहिए जो हर तरह के मामलों को सुलझा सके. किसानों से जुड़े मुद्दे, युवाओं और कई अन्य मामलों में तेज फैसले लेने की जरुरत है.

अनुभव में कमी

दूसरी ओर, पायलट गुट भी अपनी दावेदारी छोड़ने को तैयार नहीं था और उसकी ओर से कई जोरदार दलीलें पेश की गईं. कई दलीलों में एक दलील यह भी दी गई कि 2013 में चुनाव में पार्टी 21 सीटों पर सिमट गई थी. तब गहलोत को हार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी क्योंकि वह उस समय मुख्यमंत्री थे. उसके बाद उन्हें वहां पर दूसरा मौका नहीं दिया गया. जबकि सचिन पायलट को दिल्ली से राजस्थान बुलाया गया.



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