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एससी-एसटी को साधने के चक्कर में एमपी और राजस्थान में गई भाजपा की सत्ता, ये आंकड़े हैं गवाह

    

करीब 8 महीने पहले यानी 2 अप्रैल को एससी-एसटी द्वारा बुलाए गए भारत बंद के दौरान हुए हिंसक प्रदर्शन हों या सवर्ण आंदोलन, आखिरकार इसका नुकसान भाजपा को ही झेलना पड़ा है। मध्य प्रदेश और राजस्थान इन दोनों ही राज्यों में सबसे ज्यादा प्रदर्शन हुए और दोनों ही राज्यों में भाजपा चारों खाने चित हुई है। राजस्थान में भाजपा को मिले वोटों का आकलन करें तो पता चलता है कि यहां पार्टी को एससी-एसटी समुदायों का गुस्सा भारी पड़ा है। वहीं, एससी-एसटी कानून पर भाजपा सरकार के अध्यादेश के बाद सवर्ण संगठनों के आंदोलन से भी मध्य प्रदेश में पार्टी को काफी नुकसान हुआ है।

राजस्थान में भाजपा को हुआ 30 सीटों का नुकसान

राजस्थान में हुए विधानसभा चुनाव में एससी-एसटी समुदाय के लिए आरक्षित 59 सीटों में से भाजपा को महज 20 सीटों पर ही जीत मिली है, जबकि पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी को 50 सीटों पर जीत मिली थी।

इस बार यहां एससी (अनुसूचित जाति) उम्मीदवारों के लिए आरक्षित 36 सीटों में भाजपा को महज 11 सीटों पर जीत मिली है, जबकि 2013 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 32 सीटें जीती थीं। वहीं, एसटी (अनुसूचित जनजाति) के लिए आरक्षित 25 सीटों में से भाजपा को इस बार 9 सीटें ही मिली हैं, 2013 में पार्टी को 18 सीटों पर जीत मिली थी।

मध्य प्रदेश में भी यही हाल

मध्य प्रदेश में भी भाजपा का कुछ ऐसा ही हाल है। यहां जिन-जिन इलाकों में सवर्ण आंदोलन हुए, वहां-वहां भाजपा को सीटों का नुकसान हुआ है। ग्वालियर और चंबल जैसे इलाकों में जहां सबसे अधिक सवर्ण आंदोलन हुए, वहां की 34 सीटों में से भाजपा महज 7 सीटें ही जीत पाई, जबकि इन इलाकों में भाजपा और संघ का सबसे अधिक वर्चस्व है।



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