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एससी-एसटी एक्ट पर बीजेपी ने किया ऐसा काम, माया मिली न राम




सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में बदलाव करते हुए कहा था कि मामलों में तुरंत गिरफ्तारी नहीं की जाएगी, लेकिन केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर इसे पलट दिया था. इससे सवर्ण वोटर तो बीजेपी से नाराज हुए ही, एससी-एसटी वर्ग का भी पार्टी को समर्थन नहीं मिला.




हिंदी पट्टी के तीन प्रमुख राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार के पीछे एक वजह एससी-एसटी एक्ट पर जनता की नाराजगी को भी माना जा  रहा है. इस मामले में यह कहा जा सकता है कि बीजेपी को माया मिली न राम, क्यों‍कि एक तरफ उससे सवर्ण नाराज हो गए, वहीं दूसरी तरफ, उसे एससी-एसटी वर्ग की तरफ से भी बहुत समर्थन नहीं मिला.

गौरतलब है कि एससी-एसटी एक्ट पर केंद्र सरकार के अध्यादेश लाने से मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के सवर्ण वोटर काफी नाराज थे. सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में बदलाव करते हुए कहा था कि इसके मामलों में तुरंत गिरफ्तारी नहीं की जाएगी, लेकिन केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर इसे पलट दिया. एमपी में तो जगह-जगह इसके खिलाफ प्रदर्शन भी हुआ जो काफी हिंसक रूप ले गया. हालत इस कदर बदतर हो गई कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर चप्पल फेंकी गई. जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान उनके ऊपर पत्थर फेंके गए थे और काले झंडे दिखाए गए थे. चप्पल फेंकने वाले एससी/एसटी एक्ट का विरोध कर रहे थे. यह घटना मध्य प्रदेश के सीधी जिले की थी.

इस गुस्से को शांत करने के लिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि मध्य प्रदेश में एससी-एसटी एक्ट के तहत जांच के बिना किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया जाएगा. अपनी जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान चौहान ने यह भी कहा कि वह मध्य प्रदेश में एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग नहीं होने देंगे. लेकिन इसका कुछ खास फायदा नहीं हुआ.

अपनों का निशाना

इसकी वजह से बीजेपी विपक्षी दलों के निशाने पर तो है ही, पार्टी के भीतर भी उसके खिलाफ आवाजें उठती दिखाई दे रही हैं. यूपी के बैरिया विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी विधायक सुरेंद्र सिंह ने 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन का ठीकरा एससी-एसटी एक्ट पर फोड़ा है. उन्होंने कहा है कि बीजेपी को यह हार एससी-एसटी एक्ट की वजह से मिली है. उन्होंने कहा कि एससी-एसटी एक्ट में संशोधन सरकार का आत्मघाती निर्णय था. 

एक अनुमान के अनुसार मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी 15.2 फीसदी, और अनुसूचित जनजाति की आबादी 20.8 फीसदी है. सूबे में अनुसूचित जाति की 35 सीटें हैं, जिसमें पहले 28 पर बीजेपी काबिज थी. इसी प्रकार 47 अनुसूचित जनजाति बहुल सीटों में से 32 पर बीजेपी का कब्जा था.

राजस्थान की बात करें तो साल 2013 में भाजपा ने एससी/एसटी के लिए तय 58 सीटों में से 49 सीटें जीती थीं. इस बार कांग्रेस ने 31 जीती हैं. एससी/एसटी एक्ट में केंद्र द्वारा लाए गए बिल से राज्य के सवर्ण वोटर नाराज हैं. इस पर हिंसा भी हुई थी. इससे भाजपा को ही नुकसान हुआ. 

छत्तीसगढ़ में तो अनुसूचित जाति-जनजातियों के वोट का बड़ा हिस्सा है, लेकिन जिस तरह से रमन सिंह सरकार का सूपड़ा साफ हुआ है, उससे साफ है कि इस वर्ग का भी समर्थन पार्टी को नहीं मिला.

ऐसा माना जा रहा है कि एससी-एसटी एक्ट पर सवर्ण काफी नाराज थे और इस वजह से तीनों राज्यों में सवर्णों के काफी वोट बीजेपी के खिलाफ चले गए. बड़ी संख्या में नाराज मतदाताओं ने नोटा पर भी वोट डाल दिए जिसका आखिरकार बीजेपी को ही नुकसान हुआ है. दूसरी तरफ, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के वोट भी काफी हद तक तीनों राज्यों में कांग्रेस की तरफ चले गए. यह वर्ग परंपरागत तौर पर कांग्रेस का वोटर रहा है, लेकिन पिछले कुछ चुनावों से बीजेपी को भी इस वर्ग के वोट अच्छी तादाद में मिल रहे थे.

 



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