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कांग्रेस नेताओं ने खाई गंगा की कसम, 10 दिन में किसानों का लोन माफ









छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने गंगा जल लेकर कसम खाई कि राज्य की सत्ता में आने पर दस दिन के भीतर किसानों का कर्ज माफ करेंगे. पार्टी के बड़े नेताओं से लेकर छोटे नेताओं को भी मां गंगा की कसम खाकर किसानों को यकीन दिलाना पड़ रहा है कि वो किसानों के साथ झूठे वादे नहीं कर रहे हैं. वहीं बीजेपी की दलील है कि कांग्रेस भले ही गंगाजल लेकर कसम खा ले लेकिन किसान उनके झांसे में नहीं आएंगे. 

रायपुर में कांग्रेस मुख्यालय राजीव भवन में कांग्रेस के तमाम नेताओं ने सौगंध खाई कि सत्ता में आई तो दस दिनों के भीतर उनका कर्ज माफ कर दिया जाएगा. राज्य में कांग्रेस ने अपने पार्टी घोषणापत्र में भी इस बात का हवाला दिया है कि यदि पार्टी सत्ता में आई तो सबसे पहले किसानों का कर्ज माफ होगा. कांग्रेस के इस वादे से किसान गदगद हैं, लेकिन उन्हें यकीन नहीं हो रहा है कि वाकई कांग्रेस पार्टी अपने वादे को निभाएगी.

राजनीतिक दलों के वादों को लेकर किसानों का अनुभव अच्छा नहीं रहा है, इसलिए वो कांग्रेस के घोषणापत्र को ही नहीं बल्कि उसके नेताओं के वादों को भी सिर्फ छलावा समझ रहे हैं.

वहीं बीजेपी ने भी किसानों की कर्ज माफी का दावा किया है. पार्टी की दलील है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह ने किसानों के कल्याण के लिए एक से बढ़कर एक ऐसी योजनाएं चलाई हैं जिससे किसानों के सामने कर्ज लेने की नौबत ही ना आए. पार्टी ने यह भी कहा है कि राज्य की रमन सिंह सरकार ने हर साल साढ़े तीन लाख से ज्यादा किसानों का कर्ज माफ़ किया है.

बीजेपी और कांग्रेस के वादों से कन्फ्यूज किसान

इसके मद्देनजर किसानों में कन्फ्यूजन है कि बीजेपी के वादे पर यकीन करें या फिर कांग्रेस के. दरअसल, इन किसानों के साथ बीजेपी ने भी पिछले विधानसभा चुनावमें वादा किया था कि वो धान के समर्थन मूल्य 21 सौ रुपये प्रति क्विंटल तक बढ़ोतरी करेगी. साथ ही साथ 300 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से बोनस भी देगी. यही नहीं बीजेपी ने यह भी वादा किया था कि किसान की फसल का दाना दाना लिया जाएगा. लेकिन पार्टी सत्ता में आई तो धान का समर्थन मूल्य में महज 300 रुपये की बढ़ोतरी हुई. धान का समर्थन मूल्य 1450 रुपये से बढ़कर 1750 रुपये हो गया. लेकिन वादे के अनुरूप 2100 रुपये नहीं हुआ.

हालांकि मुख्यमंत्री रमन सिंह ने बीजेपी के वादे के अनुरुप पूरे पांच साल तक बोनस देने के बजाए मात्र 3 साल तक का ही बोनस दिया और तो और किसानों के फसल का एक एक दाना लेने के बजाए प्रति एकड़ मात्र 15 क्विंटल धान ही किसानों से खरीदा गया. ऐसे में किसान कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही दलों को संदेह की निगाहों से देख रहे हैं.

बता दें कि छत्तीसगढ़ में बड़ी आबादी खेती किसानी से जुड़ी है. राज्य में 20 लाख के लगभग रजिस्टर्ड किसान हैं जबकि गैर रजिस्टर्ड किसानों की संख्या 15 लाख से ज्यादा है. किसानों और उनके परिवार के वोटों को हथियाने के लिए कोई भी राजनैतिक दल पीछे नहीं है. छोटे दल हों या बड़े दल, नेता राष्ट्रीय स्तर का हो या फिर स्थानीय का हर कोई किसानों को लुभाने और मनाने में लगे हैं.

  

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