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इन नेताओं से वसुंधरा की 'रार', कहीं रोक न दे बीजेपी की रफ्तार!






ग्वालियर राजघराने की बेटी और धौलपुर के शाही परिवार की बहू व राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के व्यक्तित्व और व्यवहार को लेकर अक्सर चर्चा रहती है. जनप्रतिनिधि होने के बावजूद वसुंधरा राजे तक आम व खास दोनों ही वर्ग की पहुंच को टेढ़ी खीर माना जाता है.

विपक्ष जहां उन पर अभिमानी होने के आरोप लगाता रहता है, वहीं कई बार भारतीय जनता पार्टी के अंदर से ही उनके खिलाफ नाराजगी के स्वर भी सुनने को मिलते हैं. ऐसे में अब जबकि राजस्थान एक बार फिर विधानसभा चुनाव के लिए तैयार है, तो सवाल ये उठ रहे हैं कि वसुंधरा राजे के प्रति नेताओं की नाराजगी भारतीय जनता पार्टी के लिए नुकसानदायक न बन जाए.

इस कड़ी में राजस्थान बीजेपी के कुछ नेता ऐसे भी हैं जिन्होंने वसुंधरा राजे के आचरण की आलोचना करते हुए पार्टी से नाता तोड़ लिया है. इनमें घनश्याम तिवाड़ी, मानवेंद्र सिंह और हनुमान बेनीवाल जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं. जबकि बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे और  पूर्व मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत के दामाद नरपत राजवी ने पार्टी में रहते हुए ही वसुंधरा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है.

घनश्याम तिवाड़ी

घनश्याम तिवाड़ी बीजेपी के दिग्गज नेताओं में शुमार किए जाते थे. वह भैरोंसिंह शेखावत सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे हैं, लेकिन वसुंधरा सरकार से उनके वैचारिक मतभेद सार्वजनिक तौर पर देखने-सुनने को मिले. 6 बार विधायक निर्वाचित हुए, जिनमें से दो बार उन्हें मंत्री बनने का अवसर भी मिला. 2013 में हुए विधानसभा चुनावों में सर्वाधिक मतों से जीत दर्ज करने वाले तिवाड़ी को उम्मीद थी कि वसुंधरा राजे उन्हें मंत्रिमंडल में निश्चित रूप से शामिल करेंगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. इसके बाद वह वसुंधरा के खिलाफ बयानबाजी करने लगे.

बीजेपी से अलग होकर तिवाड़ी ने 'भारत वाहिनी' नाम से राजनीतिक दल का गठन कर लिया है, जिसे चुनाव आयोग से भी मान्यता मिल गई है. हालांकि, उन्होंने अपने बेटे अखिलेश को पार्टी का संस्थापक और अध्यक्ष बनाया है. तिवाड़ी विधानसभा की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का आह्वान कर चुके हैं और साथ ही वह गैर बीजेपी-कांग्रेस मोर्चा गठित करने की भी कोशिश में जुटे हुए हैं.

मानवेंद्र सिंह

बीजेपी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री रहे जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह भी भारतीय जनता पार्टी से अलग हो गए हैं. उन्होंने सितंबर के आखिरी हफ्ते में बाड़मेर के पचपदरा में स्वाभिमान रैली आयोजित की और बीजेपी से अपने परिवार का चार दशक पुराना रिश्ता तोड़ने का ऐलान कर दिया. मानवेंद्र सिंह ने यहां तक कह दिया कि 'कमल का फूल, बड़ी भूल' थी.

मानवेंद्र के पिता जसवंत सिंह और सीएम वसुंधरा राजे के बीच पहले काफी अच्छे संबंध थे, लेकिन पिछले सात-आठ साल में दोनों के बीच दूरी पैदा हो गई. इसी का नतीजा था कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बाड़मेर से जसंवत सिंह को टिकट देने के बजाय कर्नल सोनाराम चौधरी को मैदान में उतारा गया. जसवंत का टिकट कटने के पीछे वसुंधरा राजे को ही मुख्य कारण माना गया.

बीजेपी से टिकट न मिलने के बाद जसवंत सिंह निर्दलीय तौर पर चुनाव लड़े. मोदी लहर के बावजूद जसवंत सिंह 4 लाख से ज्यादा वोट पाने में कामयाब रहे, लेकिन जीत नहीं पीए. मानवेंद्र बीजेपी का हिस्सा थे, मगर उन्होंने अपने पिता के खिलाफ और बीजेपी प्रत्याशी सोनाराम चौधरी के पक्ष में प्रचार करने से मना कर दिया.

इसके बाद मानवेंद्र को बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर करने के साथ-साथ पार्टी से निकाल दिया गया. बीजेपी छोड़ने से पहले उन्होंने वसुंधरा राजे की गौरव यात्रा में भी शिरकत नहीं की. यहां तक कि मानवेंद्र ने अपने विधानसभा क्षेत्र शिव में वसुंधरा राजे की गौरव यात्रा कराने से भी इंकार कर दिया.

मानवेंद्र सिंह का जाना क्या बीजेपी को चुनाव में नुकसान पहुंचा सकता है? इस सवाल पर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर मानवेंद्र कांग्रेस का दामन थामते हैं तो मारवाड़ में पार्टी को फायदा पहुंच सकता है और बीजेपी नुकसान पहुंच सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि यहां राजपूत समाज का प्रभुत्व है और दशकों से राजनीति में सक्रिय जसवंत सिंह और उनके परिवार का यहां खासा असर है.

नरपत सिंह राजवी

पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत के दामाद और बीजेपी विधायक नरपत सिंह राजवी ने भी अपनी ही पार्टी के नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. उन्होंने हाल ही में वसुंधरा राजे को एक चिट्ठी लिखकर बताया कि जयपुर के बीजेपी नेता भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. 

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