टोंक। राजस्थान की राजधानी जयपुर से 100 किलोमीटर की दूरी पर बसा एक शहर जो राजस्थान का लखनऊ भी कहलाता है, अदब का गुलशन भी। मीठे खरबूजों का चमन भी, हिंदू-मुस्लिम एकता का मस्कन भी।
साल 2018 के नवंबर-दिसंबर में इसे एक नई पहचान मिल चुकी है। ये वो सीट है जहां से चुनावी रणभूमि में दो योध्दा हैं। दोनों खास। एक तरफ हैं राजस्थान कांग्रेस के मुखिया सचिन पायलट तो दूसरी ओर हैं राजस्थान सरकार में मंत्री यूनुस खान।
यूं देखा जाए तो टोंक के लिए न तो सचिन पायलट उसकी अपनी मिट्टी से उपजे नेता हैं और न ही यूनुस खान। दोनों कुछ मजबूरियों के चलते इस मैदान में उतरे हैं। सियासी मजबूरियां हमेशा मन और इच्छा पर भारी पड़ती हैं। तब और भी, जब जीत और हार के सवाल राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लगाने की ताकत रखते हों। इस केस में भी ऐसा ही है।
पहले चर्चा थी कि सचिन सिर्फ ऊपर हवा में रहकर चीजों को 'पायलट' करना चाहते हैं। जमीन पर उतरने की उनकी इच्छा नहीं। लेकिन, बाद में जब गहलोत कूदे तो उन्हें भी उतरना ही पड़ा।
उधर यूनुस खान, डीडवाना से लड़ते हैं लेकिन आनन-फानन में भाजपा ने अजीत सिंह मेहता के नाम का एलान करने के बाद भी उन्हें हटाकर खान को पायलट के सामने खड़ा कर दिया। मेहता यहां से मौजूदा विधायक हैं।टोंक का धार्मिक गणितटोंक विधानसभा सीट पर 2 लाख से कुछ ज्यादा मतदाता हैं। इनमें 60 से 70 हजार मुस्लिम मतदाता हैं। इसके बाद दलित और गुर्जर आबादी है। यहां मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। जाहिर है, पायलट और यूनुस की इस लड़ाई में टोंक का मजहबी गणित अहम हो जाता है। शायद यही वजह रही कि ऐन वक्त पर भाजपा ने रण का सिपहसालार बदल दिया यानी अजीत मेहता की जगह यूनुस खान को आगे कर दिया।